इल्म का फिल्मी सफ़र और जुल्मी दुनिया

एमएक्स प्लेअर पर हाल ही आयी नई  सीरीज ‘शिक्षा मंडल’ का पहला सीजन असरदार है।

भारत में मनमोहन सिंह के लाए ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण के बाद देखते- देखते शिक्षा जीवन से ज़्यादा करियर ओरिएंटेड हुई तो दुकान हो गयी। दुकान हुई तो सारे मूल्य बदल गए। सामाजिक मूल्यों में यह बदलाव आया कि जो मध्यवर्ग अपनी संतानों के करियर को इस सूचना के साथ बताता था कि इस काम/ नौकरी में है, इससे समाज को यह फायदा/ भला होगा, अब बच्चों के सेलरी पैकेज बताकर गौरवान्वित होने लगा। इससे पलायन का एक नया रूप सामने आया: गांवों-छोटे शहरों से बड़े शहरों की तरफ, और माता- पिताओं के भीषण अकेलेपन का मार्ग खुल गया और यह तय करना मुश्किल होता जाता है कि जेहन में मीठे दर्द की लकीर ओढ़े यह पीढ़ी संतानों के रस्मन मिलने का ज़्यादा इंतज़ार करती है या मृत्यु का!

भारत में 19 वीं सदी के समाज और धर्म सुधारकों ने शिक्षा को जरिया बनाया,  वह जरिया दुकानदारों के हाथों में पहुंचकर अजीब से खिलौने में बदल गया। सोचिए, कि स्वामी दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, सर सैयद, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, कर्मवीर भाऊराव पाटिल, स्वामी केशवानंद जैसे सुधारकों की आत्माएं आज की शिक्षा की दुकानों के बारे में सोचकर कितना दुखी होती होंगी।

 

 

आज, यह सब कहने-लिखने की एक मुकम्मल वजह है, एमएक्स प्लेअर पर आयी नई सीरीज ‘शिक्षा मंडल’ का पहला सीजन असरदार है।

सीरीज की कहानी एक कोचिंग इंस्टिट्यूट… मेडिकल एंट्रेंस के स्कैम और उसके आसपास के लोगों के जीवन के ताने-बाने से गूँथी गयी है। मेडिकल एंट्रेंस के स्कैम की भयावहता किस खतरनाक क्रिमिनल स्तर तक हो गयी है, यह मेरे लिए नया था, पर अविश्वसनीय नहीं लगा क्योंकि हमारे समाज ने उसे एक दिव्य सपने में बदल दिया है, तो दिव्यता के सपने की दास्तान में दानवों का प्रवेश न हो, ऐसा कैसे हो सकता है।

 

इस सीरीज के संवाद अलग से रेखांकित किये जाने की मांग करते हैं, इतने धारदार, चमकदार संवाद हाल के दिनों में तो नहीं ही सुने होंगे।  जैसे –

1- का भाई! जंगल  में गुम हो गए का?

2- सरकारी फ़रमान है, शहर के भीतर दारूवाले चलेंगे, दूध वाले नहीं।

3- हालात इंसान को बहादुर और बड़ा बना देते हैं

4- यह दुनिया एक दलदल है, तेंदुए जाते हैं, लक्कड़बग्घे आते हैं… और सबसे ज़्यादा गोश्त वही लेकर जाते हैं।

5- टीचर्स हमेशा सही नहीं होते।

 

यानी कुछ संवाद सूक्तियों की तरह दर्शक के जेहन में यकीनी तौर पर ठहर जाएंगे, इस सीरीज को देखते हुए यह सूक्ति सकारात्मकता मुझे कल्ट क्लासिक फ़िल्म द गॉडफादर को याद दिलाती रही। जैसे –

‘अच्छा आदमी किसको अच्छा नहीं लगता।’

ये हमारे नेता हैं? दड़बे में पड़ी हुई मुर्गियां!

सीरीज बड़ा जीवन सूत्र देती है कि “ज़िंदगी में डार्क पीरियड ही डिफाइन करते हैं कि तुम क्या हो! ” और सच यही है कि यहीं से रोशनी के सिलसिले शुरू होते हैं…

इसी तरह हौसला देती यह पंक्ति देखिए – ‘ऐसी ज़िंदगी पे लानत जो मौत के डर से मिली हो।’

 

 

इसी तरह रेखांकित किए जाने लायक बात है कि सीरीज में न्यूज चैनल के एडिटर का नाम विनोद कुमार शुक्ल होना संयोग तो नहीं होगा,  न प्रेमचंद, न सूर्यकांत त्रिपाठी। हिंदी जगत के लिए यह अलग अनुभूति रहेगी, जिसके अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

हमारे हिंदी मनोरंजन जगत की कहानियों में जिन मध्यमवर्गीय रिश्तों की तरफ देखना लगभग फ़िजूल मान लिया है, यह सीरीज उन्हें अस्मिता और शिद्दत से महसूस करवाते हुए जीवन को मुकम्मल दर्ज करती है।

हमारा जीवन कैसे रिश्तों को चैलेंज करके रिश्तों को ऊंचाइयां देना सिखा देता है, यह सीरीज में बहुत मद्धम आंच पर पकते पकवान-सा स्वाद बन जाता है। रिश्तों की चादर के महीन धागे यहां उलझते-सुलझते जिस तरह महसूस होते हैं, यह कथा-कौशल की तारीफ है।

कथा कौशल की एक बात और भी खास है कि गांव, शहर, खेत सब मिलकर भारत के जीवन का जीता-जागता दस्तावेज बन जाते हैं कि इस कहन के लिए सीरीज देखते हुए आह और वाह स्वाभाविक यानी ऑर्गेनिक रूप से, बिल्कुल बिना प्रयास मुंह से निकलते हैं।

इस सीरीज का निर्देशन समकालीन हिंदी सिनेमा के गिने-चुने प्रबुद्ध निर्देशकों में से एक :  सैयद अहमद अफ़ज़ाल ने किया है। अफ़ज़ाल की रचनाओं में नायक के बाइक भी किरदार की तरह होते हैं, कभी आरएक्स 100 होता है, तो इस बार इनफील्ड बुलट है। उसकी धुकधुकी कहानी को अलग आयाम देती है।

 

निर्देशक सैयद अहमद अफ़ज़ाल

 

मुख्य भूमिकाओं में गौहर खान, गुलशन देवय्या, पवन मल्होत्रा है। पवन मल्होत्रा दूरदर्शन के ज़माने से प्रिय रहे हैं, इधर कुछ समय से हिंदी और पंजाबी फिल्म – ओटीटी जगत उनकी भूमिकाओं की नई उड़ानें दिलफ़रेब हैं। क्लाइमेक्स पर गौहर खान के घोड़े के दृश्य में एक सुंदर फेंटेसी में ले जाकर जैसे टाइम फ्रेम को लांघ जाती है सीरीज।

सहयोगी अदाकारों में एसएम ज़हीर को लंबे समय बाद देखना बेहद सुखद अहसास है। वहीं जयहिंद कुमार, राजेन्द्र सेठी, अभिमन्यु अरुण, कुमार सौरभ निर्देशक अफ़ज़ाल साहब के चहेते कलाकार हैं जिन्हें वे लगातार अच्छी, वाज़िब भूमिकाएं दे रहे हैं। तो इस सीरीज में इन कलाकारों ने खूब रंग जमाया है।  सीरीज की कास्ट से नई हाज़रियों में नंदा यादव एक चतुर ब्यूरोक्रेट रोशनी सिंह के रूप में जैसे खिलकर और खुलकर आयी हैं, मेरे लिए इस सीरीज का अतिरिक्त हासिल है, उनकी उपस्थिति दृश्यों को ऊंचाई देती हैं। दूसरा, अख्तरी के किरदार में नवदीप सिंह , उफ़्फ़ !! क्या ही कहने!! मेरा इंट्यूशन है कि इन दोनों अभिनेताओं पर भविष्य के हिंदी सिनेमा में खास उम्मीदें रहने वाली हैं।

 

सीरीज बहुत प्यारी थपकी की तरह बताती, जताती है कि शिक्षा को हमने क्या से क्या बना दिया, कहाँ से चलकर हम कहाँ आ गए हैं! चेताती है कि अगर इस पर अभी भी सोचा नहीं गया तो भविष्य को ब्लैक होल होने से बचा नहीं पाएंगे हम और आप! सोचिए कि कहीं डिग्रियों के कागज़ी दस्तावेजों की दौड़ में हम मायने तो नहीं भूल गए शिक्षा के!  मार्कशीट, रैंक, नौकरी, पैसे, रुतबे को एकसाथ मिलाकर शिक्षा को एक प्रोडक्ट तो नहीं बना दिया हमने!

 

व्यक्तिगत रूप से मैं इसलिए भी निर्देशक की शिक्षा से जुड़ी चिंताओं की (सीरीज में) बहती अन्तर्धाराओं से जुड़ता चला गया कि एक शिक्षक का पुत्र हूँ, परिवार की कई पुश्तें शिक्षण के कर्म से जुड़ी रही हैं।

 

सीरीज में गालियां उतनी ही हैं, जितनी जता सकें कि हमारे आसपास की दुनिया इनसे रहित नहीं है, पिछले सालों ओटीटी पर गालियों के भरमार की जो संस्कृति दिखाई देती है, तो यह सीरीज उस संस्कृति का रचनात्मक, वाज़िब प्रतिरोध भी है।

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