बंदूक चलेगी तो अपना निशाना भी ढूंढ़ ही लेगी

आगामी 30 नवंबर को एक विलक्षण घटना घटने जा रही है, शायद यह पहली बार हो रहा है कि भारत के किसी लेखक को ज्ञानपीठ मिला हो और उसके बाद उसकी अगली किताब इतने उत्सवपूर्ण ढंग से प्रकाशक रिलीज करे

मैं अमिताभ घोष के नए उपन्यास ‘गन आईलैंड’ की बात कर रहा हूं जो चार भाषाओं – अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम और मराठी में तीस नवम्‍बर को एक साथ रिलीज हो रहा है। प्रकाशक हैं – वेस्टलैंड जो अब अमेजोन की सहयोगी कंपनी है। बेशक, इस उत्‍सवी रिलीज के लिए, वैस्‍टलैंड की पब्लिशर कार्तिका वीके को श्रेय जाएगा ही। वे इस मामले में भारतीय प्रकाशकों की नई पीढ़ी में बेहद दुर्लभ हैं कि उनमें साहस और विवेक दोनों हैं।

लंदन के ‘संडे टाइम्‍स’ ने इस उपन्‍यास को ‘बंगाली विंची कोड’ और ‘द वाशिंगटन पोस्‍ट’ ने अकारण ही तो ‘हमारे समय का उपन्‍यास’ नहीं बताया होगा। मेरी नजर में इसलिए भी यह खास है कि पर्यावरण विज्ञानी अमिताव घोष ने शायद पहली बार अपने अध्‍ययन के विशेष क्षेत्र पर्यावरण विज्ञान को कथा लेखन का विषय बनाया है। वे जितने बड़े उपन्‍यास अब तक लिखते रहे हैं, उस लिहाज से यह आकार में छोटा उपन्‍यास है, केवल 396 पेज का। वे बड़े आकार में बड़ी बात कहना जानते हैं, तो छोटे में बड़ी बात कहने का हुनर भी रखते ही होंगे, मेरा बड़ा यकीन है।

शुद्ध साहित्य यानी जिसे हम पल्प या लोकप्रिय लेखन से अलग करते हैं,  के लिहाज से भी भारतीय साहित्य की यह एक अद्भुत घटना है, सेवा में सविनय निवेदन है कि इसका यह संज्ञान भारतीय साहित्यिक जगत में लिया ही जाना चाहिए, और यह संज्ञान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अमिताभ घोष पहले भारतीय अंग्रेजी लेखक हैं जिन्हें भारतीय ज्ञानपीठ ने सम्मान के लिए चुना, क्योंकि उनसे पहले भारतीय भाषाओं को तो भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्‍कार मिलता रहा है परंतु अंग्रेजी में किसी भारतीय लेखक को यह इनाम नहीं दिया गया था।

अमिताभ घोष की तीन उपन्यासों की श्रृंखला या इबिस ट्रिलॉजी बेहद चर्चित रही है – ‘सी ऑफ़ पॉपीज’, ‘रिवर ऑफ स्‍मोक’, और ‘फ्लड ऑफ़ फ़ायर’, उनमें से पहले ‘अफीम सागर’ पर पीपली लाइव फेम डायरेक्‍टर अनुषा रिजवी सालों से फिल्म बनाने की कोशिशों में जुटी हैं।

 

 

व्यक्तिगत रूप से मैं अमिताभ घोष का फैन ब्रिटिश भारत के समय बर्मा यानी म्यांमार के पतन पर आधारित पीरियड कहानी ‘ग्लास पैलेस’ यानी ‘शीश महल’ उपन्यास को पढ़कर हुआ। कैसे राजपरिवार की एक सेविका किशोरी डोली और प्रवासी बंगाली अनाथ मजदूर लड़के राजकुमार साहा की प्रेमकथा उपमहाद्वीप का म‍हाकाव्‍यात्‍मक आख्‍यान बन जाती है, उसको पढ़ने का सुख अनिर्वचनीय है, गूंगे का गुड़ ही है, यानी पढ़कर ही समझा और महसूस किया जा सकता है। दीनू एक जरूरी किरदार के रूप में वहां भी है, शायद वहीं कायांतरित होकर दीन दत्‍ता होकर बंदूक द्वीप में आ गया हो। इसे पढ़ते हुए, जिस जगह लेखक होता है, लगता है कि लेखक वहीं का है, यानी उसी का अपना लोकेल है, पाठक को यह अहसास दिला देना आसान नहीं है। उनका कथा संसार लोकेल का जिस तरह एक्‍स्प्‍लोरेशन और ट्रांजिशन लेता है, सदियों  में झूलते जीवन को व्‍यापक फलक पर महसूस करने का अलग ही स्‍तर और नजरिया पाठक को देता है। वे गांव-शहरों और संस्‍कृतियों ही नहीं, महाद्वीपों का कमाल ट्रांजिशन लेते हैं। देशकाल का ऐसा जादुई यथार्थ बुनना उन्‍हें अपने समकालीनों में कहीं बहुत अलग बना देता है। वे अक्‍सर अपनी किताबों के बीच लंबे-लंबे अंतराल लेते हैं, पर जब-जब किताब आती है तो वह अंतराल सार्थक लगता है कि लेखक ने सालों इस पर मेहनत की है।

मेरे अनुभव संसार और निकट अतीत में किसी समकालीन लेखक में यह भाषा का जादू, यह प्रामाणिकता, यह सूचनात्मक विस्तार और विस्तृत कथानक को डील करने का नजरिया और हुनर लगभग नहीं ही पाया है। बतौर लेखक, मैं तो इस लेखन को प्रेरणा और समकालीन शीर्ष की तरह देखता ही हूं, मुझे लगता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के हर नए पुराने लिखने वाले को उनके लेखन से गुजरना चाहिए कि लेखन कोई शौक भर का मसला नहीं है जिसे लेखक अपने मजे भर के लिए लिखकर संतुष्‍ट हो जाए, लेखन दुसाध्य श्रम का कर्म है, इसे जिम्मेदारी के साथ समय, शोध और सजगता के साथ इस तरह से किया जाना चाहिए। हमारे उपमहाद्वीप के परिवेश, सांस्कृतिक निरंतरता को कैसे लेखन में लाया जाना चाहिए, यह उनके लेखन से सीखने लायक है।

पिछले दशक से भारतीय अंग्रेजी लेखकों के क्षितिजों का विस्‍तार हो रहा है, हाल ही विलियम डेलरिम्‍पल के ‘अनार्की’ और ‘कोहीनूर’ ने जो ख्‍याति अर्जित की है, वह असाधारण है, दोनों के वेबसिरीज बनाने के अधिकार मोटी एडवांस राशि पर गए हैं। इससे पहले पेंगुइन से हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हुए शम्‍सुर्रहमान फारूकी के उर्दू उपन्‍यास ‘कई चांद थे सरे आसमां’ की ख्‍याति पश्चिम के अंग्रेजी जगत में सिर चढ़कर बोल रही है, यह भी कोई छुपी हुई बात नहीं है। यह भी हमारे समय में घटित एक असाधारण घटना थी कि भारत की किसी गैरअंग्रेजी जुबान की किताब को अंग्रेजी में इतना प्‍यार अंग्रेजी प्रकाशन जगत ने दिया हो।

मेरे संज्ञान में लाया गया है कि हिंदी की वरिष्ठ लेखिका अलका सरावगी के दूसरे उपन्यास ‘शेष कादम्बरी’ का अंग्रेजी, बांग्ला और इटालीयन संस्करण ऑक्सफ़र्ड बुकशॉप में एक साथ रिलीज़ हुआ था। पर प्रकाशकों द्वारा पर्याप्त सोशल मीडिया प्रचार को ऐसे इवेंट और नई हिंदी किताबें तरसती रहती हैं, यही त्रासदी है।

अमेजोन पर ‘गन आईलैंड’ के मनीषा तनेजा द्वारा अनूदित हिंदी संस्‍करण ‘बंदूक द्वीप’ के प्री-ऑर्डर के लिए किताब का परिचय देते हुए लिखा गया है – ‘बन्दूक़’। एक साधारण सा शब्द, लेकिन यह शब्द दीन दत्ता की दुनिया को पलट कर रख देता है… दुर्लभ पुस्तकों का डीलर, दीन, घर के अंदर शांति से समय बिताने का आदी है, लेकिन जैसे-जैसे जीवन के बारे में उसकी ठोस धारणाएँ बदलने लगती हैं, वह एक असाधारण यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर हो जाता है; एक ऐसी यात्रा जो उसे भारत से लॉस एंजेलिस और फिर वेनिस तक रस्ते में मिलने वाली यादों और अनुभवों के माध्यम से एक पेचीदा मार्ग पर ले जाती है। इस कहानी में पिया है, “अमेरिका में पली-बढ़ी एक बंगाली लड़की जो उसकी यात्रा का कारण बनती है।” सच में कितनी टेम्‍पटिंग है यह भूमिका।

मुझे लगता है कि तीस नवंबर की इस घटना को हर भारतीय साहित्य प्रेमी को अलग से सेलिब्रेट करना चाहिए, गर्व की अनुभूति होनी चाहिए क्योंकि यह भारतीय साहित्य का वह प्रस्थानबिंदु बनने वाला है जिससे आगामी दशकों और आगामी सौ सालों में हम नई जमीन पर खड़े होंगे।

पसंद आया तो कीजिए लाइक और शेयर!

आप इसे भी पढ़ना पसंद करेंगे

मैडम चीफ़ मिनिस्टर फ़िल्म का रिव्यु | Madam Chief Minister film review in Hindi

Era Tak

दिलवालों की बस्‍ती उर्फ पाताललोक की दिल्‍ली

Dr. Dushyant

Liar’s dice

Naveen Jain

मस्तमौला किशोर दा

Chaitali Thanvi

खोए हुए जूते और तेज़ दौड़ने की ज़ि‍द में लड़खड़ाया बच्‍चा

Dr. Dushyant

Hope aur Hum (होप और हम) मूवी रिव्यू

Naveen Jain