होनी : समीर रावल की लिखी

दस साल का फ़िरोज़ अपनी अम्मी के बग़ैर नहीं रह पाता था। सुबह-सुबह अम्मी ही उसे प्यार से चूल्हा जलाते-जलाते आवाज़ लगाकर उठाती, वो फिर भी अनसुना कर देता। फिर अम्मी उसके पास आती, उसे जी-भर के चूमती, गले लगाती और उठने को कहती। ये फ़िरोज़ को बहुत पसंद था, वो धीरे से आँखे खोलता और अम्मी उसे उठा देख और ख़ुश हो जाती। फिर दोनों मिलकर दिन भर समय बिताते और एक साथ काम करते। कुछ सालों पहले अम्मी उसे स्कूल भर्ती कराने ले गई थी, पर वहाँ पहुँचते ही उसका जी घबराने लगा और उल्टी हो गई। फिर अम्मी ने स्कूल का कभी नाम ही नहीं लिया।

उन दोनों के अलावा उनके परिवार में कोई नहीं था। जब से फ़िरोज़ ने थोड़ा-बहुत होश सम्भाला था उसके छोटे से संसार में केवल अम्मी ही थी। शुरू से ही अम्मी उसे अपने साथ रेहड़ी पर सब्ज़ी और फल बेचने ले जाती थी और यही उसका सम्पूर्ण जीवन था। इतना पैसा और समय तो उनके पास नहीं था कि वो लोग कहीं घूमने-फिरने या किसी से मिलने-जुलने जा सकते। रेहड़ी हर दिन लगानी पड़ती और वो भी काफ़ी घंटे ताकि ठीक तरह से खाना-पीना हो जाए। कभी-कभी कुछ कमाई नहीं होती थी, एक अकेली औरत को रेहड़ी लगाने में जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता था वो अलग। बावजूद इसके अम्मी और बेटा अपनी एक कमरे की दुनिया में मगन थे, संतुष्ट थे।

उस दिन सुबह रेहड़ी ले जाते समय रास्ते में फ़िरोज़ की आँखे एक ठेले में एक डंडे पर लटकाए गए बड़े से शिवजी के लौकेट पर पड़ी। उसे देख उसकी नज़र वही अटक गई। काले रंग के धागे में पिरोए शिवजी के लौकेट ने उसका दिल मोह लिया: चमकीले सुनहरी रंग के प्लास्टिक में जड़ी उनकी जटा, त्रिशूल व भंगिमा को देखकर वो वही रुक गया और टकटकी बांधे उसे देखता रहा। फिर वो ठेले में पड़े बाक़ी सामान पर भी नज़र फेरता रहा पर शिवजी के सामने वैष्णो देवी, माँ लक्ष्मी, भगवान राम या हनुमान किसी की भी दाल नहीं गली। वहाँ अम्मी कुछ मीटर आगे निकल गयी थी। थोड़ी दूर जाने पर उसे पता चला कि फ़िरोज़ तो पीछे रह गया, तो वो रेहड़ी ठेलते-ठेलते वापस लौटी और उसे शिवजी का लौकेट निहारते पाया। अम्मी ने ठेले वाले से पूछा कि लौकेट कितने का था तो उसने आदतन बढ़ा-चढ़ा रेट बताया। अम्मी ने बताए गए रेट के आधे पैसे ठेले वाले के हाथ में धरे, खुद लौकेट निकालकर फ़िरोज़ को दिया और दोनों अपनी राह चलते बने।

फ़िरोज़ के एक हाथ में अम्मी का हाथ था तो दूसरे में उसने लौकेट भींच कर रखा हुआ था। अपनी जगह पर पहुँचकर कर अम्मी ने रेहड़ी ठीक से लगाकर लौकेट फ़िरोज़ के गले में डाल दिया।

उस दिन गलियों में कुछ ज़्यादा ही पुलिस दिख रही थी। अम्मी ने कुछ ध्यान नहीं  दिया पर ग्राहक भी न के बराबर आ रहे थे। एक बजे अम्मी ने फ़िरोज़ को कुछ रुपए देकर पास की ही गली में एक खोमचे वाले से छोले-कुलचे लाने भेज दिया। कुछ दूर रास्ते में फ़िरोज़ को दूर से एक हुजूम आता दिखा तो वो समझा कि कोई गाने-बजाने वाला जुलूस होगा और वो बग़ल में एक गली के मुहाने पर रुक गया। जब हुजूम पास आया तो दिखा कि सबने लाठी, डंडे, भले और कइयों ने तो रिवाल्वर थामे हुए थे और ख़ूब ज़ोर-शोर से ‘जय श्री राम’ व ‘जय शिव-शम्भु’ के नारे लगाए जा रहे थे। झुंड बढ़ता-बढ़ता अम्मी की रेहड़ी के पास पहुँचा और फिर कुछ झगड़े की आवाज़ और चीखें सुनाई पड़ीं, जैसे कोई हताहत हुआ। फ़िरोज़ की गली से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। झुंड दो ही मिनटों में आगे बढ़ गया।

फ़िरोज़ को दूर से अम्मी रेहड़ी पर खड़ी दिख नहीं रही थी तो वो भाग-भागकर वहाँ पहुँचा। उसने अम्मी को नीचे गिरा पाया और देखा कि उसके माथे से बहुत खून बह रहा था। वो रह-रहकर फ़िरोज़ का नाम ले रही थी। फ़िरोज़ ने अम्मी का सिर अपनी गोद में लिया और रोने लगा। अम्मी कभी होश में आती, कुछ बुदबुदाती और फिर से बेहोश हो जाती। पुलिस दूर दिख रही थी, पर कोई फ़िरोज़ की मदद को नहीं आया। कोई सड़क पर आ-जा भी नहीं रहा था। आधे घंटे बाद अम्मी एकदम चुप हो गई, फ़िरोज़ घबराकर उठा और उसने सोचा कि उसी खोमचे वाले से जाकर कुछ मदद माँगे कि दूसरी तरफ़ से एक और हुजूम आता दिखा। फ़िरोज़ को कुछ समझ नहीं आया, वो वहाँ से सरपट भागते हुए कुछेक मीटर निकला ही था कि उस हुजूम के पाँच-छह लोगों ने उसे भागकर पकड़ लिया। फ़िरोज़ ने सुना कि उनके पीछे झुंड वाले लोग ‘अल्लाह-हो-अकबर’ के नारे लगा रहे थे।

जिन आदमियों ने फ़िरोज़ को पकड़ रखा था वो कुछ नहीं बोले, उन्होंने रेहड़ी के पीछे पड़ी अम्मी की जड़ देह की ओर देखा, फिर एक आदमी ने फ़िरोज़ का लौकेट हाथ में लेकर बाक़ियों को दिखाया।

फ़िरोज़ के सिर पर अचानक से एक वार हुआ, उसे शायद कोई दर्द नहीं हुआ होगा। एक झन्नाहट सी हुई फिर उसके कान सुन्न पड़ गए और वो ज़मीन पर गिर गया।

पर नहीं, उन दोनों की क़िस्मत में अभी एक-दूसरे का साथ और ज़िंदगी बाक़ी थी। शाम को उस मौहल्ले के कुछ शर्मदार लोग चप्पे-चप्पे पर पुलिस की मौजूदगी के बीच हालात देखने निकले और उन्होंने फ़िरोज़ और अम्मी को नज़दीकी हस्पताल पहुँचाया, जहां उन्हें काफ़ी ख़ून चढ़ा लेकिन दो हफ़्ते आईसीयू में रहने के बाद दोनों की जान बच गई। उनकी रगों में दौड़ने वाला वो ख़ून उस हस्पताल में आस-पास के मौहल्लों के मंदिर और मस्जिदों के पंडितों, मौलानाओं, उनके परिवार वालों और बहुत से अनाम लोगों के द्वारा किए गए रक्त-दान से प्राप्त किया गया।

 

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