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वैश्विक आपदा कोरोना काल में गांधी चिंतन

कोरोना वायरस या कोविड-19 एक ऐसी त्रासदी है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. यह इस सेंचुरी की सबसे बड़ी त्रासदी है और जिसकी समस्या कितनी बड़ी होने वाली है इसकी कल्पना करना भी असंभव है. जो आज के हालात हैं, पूरी दुनिया इससे संक्रमित है. हम नहीं समझ पा रहे हैं – यह क्यों हुआ, कैसे हुआ और क्या इसका निदान है. परंतु एक बात समझ में आ रही है कि विधाता की रचना को हमने बहुत जल्दी छेड़छाड़ करके इस दुर्दशा तक पहुंचाया है.

आज जब सब लोग बुरी तरह से परेशान हैं, त्रस्त हैं और कोई भी देश इससे नहीं बचा है तो इसका क्या कारण है; यह ढूंढ़ पाना और यह कह पाना कि यही एक कारण है, सिर्फ अटकलें साबित होगा. क्योंकि इतनी बड़ी त्रासदी न तो अपेक्षित थी, नाही हम इसकी कोई भी कल्पना कर सकते थे. अब चूंकि आज यह चुनौती सामने आ चुकी है तो हम यह सोचने को मजबूर हैं कि इस दुनिया को स्वच्छ और रहने लायक बनाना है तो हमें पुनर्विचार करना पड़ेगा.

हमें अपनी आकांक्षाओं, अपेक्षाओं को कम करते हुए इस पूरे ब्रह्मांड को, इस पूरी दुनिया को रहने काबिल बनाना होगा ;अन्यथा आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी. यह हमारे भविष्य का सवाल है. यह सोचने का विषय है; यह समझने और समझाने का विषय है. इसमें किसी तरह का कोई ज्ञान बांटने की आवश्यकता नहीं है बल्कि अपने तजुर्बे से हर आदमी इसको अच्छी तरह से समझ पाने में समर्थ है. एक बच्चा भी आज जानता है, समझता है, महसूस करता है कि इस दुनिया में जो कुछ भी गलत हुआ है वह नहीं होना चाहिए था. आज हम अगर बाहर निकलते हैं तो हर तरफ का वातावरण शांत दिखाई देता है जो शायद हमें इस बात का एहसास कराता है कि यह दुनिया कितनी शांत और खूबसूरत है.

हम जब देखते हैं कि चारों तरफ तो चिड़िया चहचहा रही होती हैं जिनकी आवाज़ पहले मानव निर्मित शोर में कहीं दब गई थीं. पेड़ों में, पत्तों में हरियाली दिखाई देती है जिन पर धूल की परत जमा रहती थी और फूल खिल रहे होते हैं जो पहले मुरझाए लगते थे. जानवर सभी आराम से विचरण कर रहे होते हैं और यहां तक कि समुद्र के किनारे मछली, डॉल्फिन और कई तरह के जानवर बाहर निकल कर आराम से विचरण कर रहे होते हैं. इस तरह की स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई जोकि इस बात का संदेश है कि अगर इस दुनिया में रहना है तो हमें इस प्रकृति के नियम का पालन करना ही पड़ेगा जो यह सिखाएगा कि हमें किस तरह रहना है.

आज की परिस्थितियों में गौर से देखें तो हम पाएंगे कि हमारी आवश्यकता बहुत सीमित हो गई हैं. इसलिए हमें अपनी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सामान का उपयोग करना पड़ रहा है और हमें इस बात की आदत पड़ रही है कि किस तरह अभाव में भी अपने आपको खुश और जिंदा रख सकते हैं. जहां तक सवाल है उन गरीबों का, लाचार व्यक्तियों का, बीमार व्यक्तियों का जो हमारे आसपास हैं तो ऐसे में क्या करें, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है. लोग स्वयं अपने आसपास रहने वाले लोगों के प्रति संवेदनशील हो रहे हैं और वे दूसरों की मदद करने के लिए व्याकुल हैं.

हर व्यक्ति जो घर में बैठा है वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है और कोशिश कर रहा है कि अपने आसपास के लोगों की मदद कर सके. हमारा दिल एकदम से भयभीत हो, व्याकुल हो जाता है जब हम देखते-सुनते हैं कि किस तरह से लोग सड़कों पर बैठे हैं और इंतजार कर रहे हैं किसी की मदद का; कि अचानक कोई फरिश्ता बनके उनके पास आकर उनकी मदद करने लगता है. यह ऐसा दृश्य है, ऐसा माहौल है जिसे किसी ने नहीं बनाया जो अपने आप व्यक्ति की मनुष्यता को दर्शाते हुए स्वत: पैदा हो गया. हम सब मिलकर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि इस विषम परिस्थिति में हम सबको शक्ति दे और जो पाप हमसे हुए हैं उसके लिए हमें क्षमा करें. हम सब लोगों को मिलकर इस तरह का वातावरण, इस तरह की स्थिति बनानी चाहिए कि हम फिर प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करेंगे. अपने जीवन को सफल बनाएंगे और अपने साथ-साथ दूसरों को भी जीने की प्रेरणा देंगे.

यह प्रकृति हम सबके लिए है. 600 -700 करोड़ लोग दुनिया में रहते हैं अगर सबको बराबर से अपना हिस्सा मिले तो न तो कोई भूखा रहेगा, न बीमार होगा. अगर होगा तो हम एक-दूसरे के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा सकेंगे. समझने और समझाने की बात है कि हम यह कैसे भूल गए कि यह दुनिया सबके रहने के लिए है. यह किसी एक व्यक्ति विशेष या किसी एक समुदाय या किसी एक देश की संपत्ति नहीं है. यह प्रकृति की अनमोल देन है जो सबके लिए है. जो इस दुनिया में आए हैं इस बात को अगर हमेशा ध्यान रखें तो ऐसी स्थिति नहीं पैदा होगी जिसमें प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे को नीचा दिखाना अपने विकार, अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना जो हम आज कर रहे हैं.

एक दूसरा पहलू भी इस विषम समस्या के सामने समझ में आ रहा है कि अपने-अपने देश में अपने-अपने संसाधनों पर अगर हम विचार करें तो अपनी आवश्यकताएं सीमित हो सकती हैं. उनको पूरा करने के लिए हम कई तरह की कोशिशें कर सकते हैं और अपने देश में ही रहते हुए हम आवश्यकता को पूरा करने का प्रयत्न कर सकते हैं और ऐसा संभव है. अगर आप महात्मा गांधी के विचारों पर ध्यान दें तो आज के संदर्भ में उनके विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. जिसमें उन्होंने कहा था कि अपने उद्योगों को, घरेलू उद्योगों को गांव-गांव तक ले जाएं और हर गांव को इतना सक्षम बनाएं कि वे अपनी आवश्यकताओं को अपने दायरे में रहते हुए पूरा कर सकें.

इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम हमेशा सरकार के ऊपर निर्भर न रहें क्योंकि सरकार के पास संसाधन और संचय सीमित है जोकि कुछ समय तक तो इस देश को चला सकते हैं लेकिन साथ-साथ हमलोगों का भी दायित्व बनता है कि हम समाज में रहते हुए अपने संसाधन से, अपनी आवश्यकताओं से अधिक वस्तुओं को उनको उपलब्ध कराएं जो असहाय-अपंग हैं और जो दूसरों पर निर्भर है.

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