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हनुमान आज भी कितने प्रासंगिक

आज के संदर्भ में, राम कथा में, हनुमान कितने प्रासंगिक हैं, इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता. राम के लिए हनुमान की निष्ठा और कर्तव्य परायणता अपनेआप में एक उदाहरण प्रस्तुत करती है. हमारे जीवन में हमारे समाज में और खासतौर से आज के कारपोरेट जगत में ऐसे हनुमान मिल जाएंगे जो संस्था के लिए अपने जीवन को पूरी तरह से समर्पित करने के लिए तैयार रहते हैं. शायद इन्हीं हनुमान पर ही किसी भी कार्य की सफलता निर्भर करती है.

अगर आप अपने चारों तरफ देखें तो ऐसे हनुमान बहुत नहीं तो एक-आध जरूर दिख जाएंगे जो किसी भी कारपोरेशन में जी-जान से मेहनत करते हुए उसे अपनी निष्ठा से बहुत ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम होते हैं. अगर हम देखें तो कारपोरेट जगत के निर्माता या संस्थापक ऐसे ही हनुमान के सहारे अपने कारपोरेशन के झंडे को सातवें आसमान तक ले जाने में सफल होते हैं.

अगर आपको विश्वास ना हो तो विचार करिए और गौर से देखिए तो आपको ऐसे हनुमान हमेशा नजर आ जाएंगे. इसी संदर्भ में हम एक बात और कहना चाहते हैं कि हनुमान तो हैं लेकिन उन हनुमान की कद्र करने वाले राम का भी होना आवश्यक है. राम से हमारा तात्पर्य उन लोगों से है जो किसी भी संस्था या कारपोरेशन के मालिक होते हैं या संस्थापक होते हैं. ऐसे संस्थापक के लिए आवश्यक है कि उन हनुमान को पहचाने जो निष्ठावान हैं, जो ईमानदार हैं, जो कर्तव्य परायण है और जिनके कारण उनका कारपोरेशन आज आगे-आगे चल रहा है.

संस्थापक जो राम कथा के अनुसार राम का पात्र निभा रहे हैं, उन्हें अपने आसपास राम की सेना के विभीषण-सुग्रीव-जामवंत जैसे पात्रों को भी पहचानना पड़ेगा जो उनके आस-पास हैं, उनकी व्यवस्था में हैं या उनकी संस्था में हैं और उन्हीं लोगों के कारण राम की सेना इतनी मजबूत बनकर तैयार हुई जिन्होंने रावण जैसे महान योद्धा को परास्त कर दिया.

इस संदर्भ में एक बात और अवश्य समझने की है कि रावण ने जिस प्रकार अपने विश्वासपात्र और ईमानदार धर्मनिष्ठ भाई को अपने राज्य से बाहर निकाल दिया और उसकी कोई भी उपयोगिता नहीं समझी; यह इस बात का एक उदाहरण है कि कोई भी संस्था, कोई भी कारपोरेशन अगर रावण की तरह राज्य को चलाना चाहेगी तो उसका वही हाल होगा जो लंका का हुआ अर्थात रावण ने अपने विश्वसनीय और ईमानदार व्यक्ति को अपने राज्य से बाहर निकाल दिया और उसका परिणाम यह हुआ कि वह उसके दुश्मन की सेना से जा मिला. इस संदर्भ में विभीषण का उदाहरण देना चाहता हूं कि जब लंका से रावण ने विभीषण को बाहर निकाल दिया तो उसके पास दो ही विकल्प थे या तो वह सन्यास ले लेता या अपने जीवन को सार्थक करते हुए राम के पास, राम के शरण में जाकर उनकी सेना में चला जाता.

आज कारपोरेट जगत में भी देखा जा रहा है कि जो लोग अपनी संस्था को रावण जैसे संस्थापक या व्यवस्थापक के सहारे चलाते हैं, वो जरूर उन लोगों को भी विभीषण की पदवी दे देते हैं जो ईमानदारी से काम कर रहे हैं और हिम्मत से अपनी सच्ची बातों को कहने का साहस रखते हैं. यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनका उद्देश्य केवल उस संस्था के भले की सोचना है ना कि किसी की चापलूसी करना. और ऐसी परिस्थिति में अगर उन्हें विभीषण की तरह संस्था से बाहर कर दिया जाता है तो वे बड़ी आसानी से उन लोगों के पास चले जाते हैं जो अपनी संस्था में अच्छे लोगों को लेने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. यही हुआ विभीषण के साथ और यही कारण बना रावण के विघटन का, अंत का.

उम्मीद है कि इस कहानी से यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि निष्ठावान ईमानदार सच्चे कर्मचारियों को बचा के रखें, संभाल के रखें; ऐसा ना हो कि उनके बिखर जाने से आप अपना तो नुकसान कर ही रहे हैं साथ ही अपने कंपटीशन को एक मौका दे रहे हैं कि वे आपकी नीति व आपके रहस्य को समझ कर आपको आसानी से कंपटीशन उपलब्ध करा दें.

यह घमंड कि हम तो अविजित हैं; अगर हम ऐसी सोच लेकर चल रहे होते हैं तो जो रावण और उसकी लंका का हाल हुआ; उसी तरह से कंपनियों का हाल होता देखा गया है और इसमें कोई शक नहीं कि बहुत बड़े-बड़े कारपोरेट हाउसेस बंद हो गए-फेल हो गए और इसके विपरीत वे छोटे-छोटे हाउसेस बड़े होकर सामने आ गए जिन्होंने कर्मचारियों की उपयोगिता को समझा और उनको हमेशा प्रोत्साहित किया.

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