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कोविड-19 में सोशल नेटवर्किंग से कर रहे ऐसे राह आसान

इस रुकी हुई और मजबूरन थमी हुई दुनिया में भी बीतते समय के साथ, देखो, लोग चलने लगे हैं। कुछ अलग चाल से, कुछ अलग ही अंदाज़ में!

इस वक्त जहाँ मैं अपने कंप्यूटर पर एक विंडो पर JLF के #JLFBraveNewWorld के ज़रिये एक गंभीर साहित्यिक बातचीत सुन रही हूँ तो वहीं दूसरी विंडो पर AGC (Allahabadi Global Connect) के एक सुरीले सफर का साथ है; तो यह विचार कौंधा। हाँ, मैं दोनों को अक्सर साथ सुनती हूँ, किसी को मिस नहीं कर सकती न!

कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन ने एक नई जीवन शैली सामने ला दी। पूरी दुनिया बदलने लगी। आखिर उसने भी टीवी के उबाऊ कार्यक्रमों और घर-ऑफिस के थकाऊ कामों से अलग कुछ देखने-सुनने का रास्ता निकाल ही लिया। विश्व के और देशों के जैसे भारत में भी इसके सफल प्रयास हुए। इन 2 उदाहरणों के ज़रिए इसे आसानी से समझ सकते हैं।

#JLFBraveNewWorld ने एक ऐसी दुनिया की ओर खिड़की खोल दी जहाँ तमाम देशों के साहित्यिक और वैचारिक ज़मीनों से जुड़े लोग अलग-अलग अपने देशों में बैठकर आपस में किसी टॉपिक पर बातचीत करते हैं और उसे हमलोग अपने देश में बैठकर देख रहे और सुन-समझ रहे होते हैं।

तो जनाब, यह है तकनीक का बेहतरी के लिए इस्तेमाल!

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) जो जयपुर के होटल डिग्गी पैलेस में आयोजित होते-होते, गए दशक भर में विश्व साहित्य जगत की सक्रियता का पर्याय बन गया, अब ग्राउंड से ऑनलाइन अवतार ले चुका और नए कीर्तिमान गढ़ने के साथ-साथ अपनी सार्थकता को बनाने के नित नए जतन कर रहा है। इसके लिए फेस्टिवल के डायरेक्टर्स की तिकड़ी Namita Gokhale, William Dalrymple और Sanjoy K Roy बधाई के पात्र हैं।

यकीन मानिये, कोरोना काल के चलते जान पर बन आई परिस्थितियों में इन सेशंस ने और तमाम देशों के स्पीकर्स-एक्सपर्ट्स की बातें, उनके अनुभव, और साथ ही सुझावों ने बहुत राहत दी है। इसने नई सोच, नए रास्तों और ख़ुद को सकारात्मक और क्रिएटिव रखने के तमाम रास्तों से मिलवाया भी है। #JLFBraveNewWorld के देखते-देखते आज 90 एपिसोड हो रहे हैं जिनमें आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, इकोनॉमिक्स : ड्यूरिंग एंड पोस्ट पेनडेमिक, क्लाइमेट चेंज, जिओपॉलिटिक्स, मेन्टल हेल्थ जैसे नॉन-फिक्शन के साथ-साथ फिक्शन के हर क्षेत्र के तरह-तरह के टॉपिक उठाये गए जिनमें दुनियाभर के 180 स्पीकर्स और ऑनलाइन दर्शकों के साथ इंटरेक्टिव सेशन से एक बेजोड़ नाता जोड़ा गया। इसके हफ्ते में तीन दिन सेशन होते हैं जिसमें दर्शक-स्पीकर्स के तौर पर लगभग सारे देशों के लोग शामिल होते रहे हैं।

यह एक तरह की PAN-global साझा कोशिश है। तो दूसरी ओर एक अलग ही मिसाल बनते दिख रही है जिसके अभी 100 दिन ही पूरे हुए लेकिन यह भी अपनी अलग पहचान के तौर पर सामने आई।

AGC (Allahabadi Global Connect) उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से शहर इलाहाबाद, वर्तमान में प्रयागराज, के रहवासियों या इसे दिल में बसाए इलाहाबादियों का एक क्लोज़ ग्रुप है जिसे कोई 7-8 लोगों की मिली-जुली कल्पनाओं की पहल का साकार रूप कहा जा सकता है। और हालिया इसको सँभालने का ज़िम्मा 11-12 लोग निभा रहे हैं जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। इसमें एक अजीब सी दिलकशी है। लोग एक-दूसरे से इतने सवाल करते हैं कि इन प्रयासों को AGC का KBC तक कहा जाने लगा।

यह साथ शुरू हुआ था तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह ग्रुप इस कदर सफल होगा; कोई 30 से भी ज्यादा देशों के 17000 से भी ज़्यादा लोगों को जोड़ने में, दूर-दराज़ से ताल्लुक रखते हुए, इतने मानसिक दबाव के समय उन्हें अपनी ज़मीन की उन यादों से जोड़ने में जिसकी यादों की हूक उठती रहती थी। इस ग्रुप में इलाहाबादी संस्कृति को गहराई से महसूस किया जा सकता है, भाषा, बोली-ठिठोली से लेकर पकवान, गली-मोहल्लों का ज़िक्र से लेकर बतकही-बकैती तक हर शय में। AGC ने अपनी पहचान आप बनाने की कोशिश जारी रखी और बीतते समय के साथ बदलती ज़रूरतों का भी पूरा ख़याल रखा और अपने ग्रुप के सदस्यों को एक वृहद वर्चुअल परिवार का भान भी करवाया।

इसके लिए ग्रुप के सदस्यों की मदद के लिए कई क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स को आमंत्रित किया गया और उनके लाइव सेशंस करवाए गए। जिनमें कोविड के समय टैक्स से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की गई, आयुष विशेषज्ञों से मदद ली गई, घर में कैद से हो गए बच्चों की बालरोग से जुड़ी परेशानियों को उठाया गया तो मनोचिकित्सक को भी UK से संपर्क साधा गया, और तो और योग पर भी ग्रुप के सदस्यों को जागरुक करने के सेशंस किये गए।

AGC ने जहाँ सोशल नेटवर्किंग की तो वहीँ प्रोफ़ेशनल नेटवर्किंग को भी नई ऊर्जा दी। लोग सिर्फ पकवानों या जगहों की बात ही नहीं पूछते रहे, वे अपने कौशल को भी सबके सामने लाने लगे – चित्रकारी, लेखन, गायन, पाककला और न जाने क्या-क्या… और ऐसे ही फिर हर शुक्रवार को एक सेशन शुरू हो गया, ‘शख्सियत’ नाम से जिसमें शहर इलाहाबाद से जुड़ी प्रतिभाएं मुखर होने लगीं।

और सच मानिये, यह तो अभी शुरुआत है… ये मेरे पसंदीदा उदाहरण हैं, आपदा में अवसर खोजने और उसे पाने के लिए जुट जाने के! इन दोनों प्रयासों के आयाम एकदम जुदा हैं लेकिन जाने कितने ही मुकाम ऐसे प्रयास हासिल करते जायेंगे और मील के पत्थर पार करते जायेंगे।

आने वाले वक्त के हाथों में कई राज़ हैं,

तो मेरे इन्सान के हाथ भी तो करामात हैं!!

 

क्या आप भी ऐसे किसी ग्रुप से जुड़े हैं? तो कमेन्ट में बताएं। ऐसे प्रयासों से सबको मिलवाएं।

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