मैडम चीफ़ मिनिस्टर फ़िल्म का रिव्यु | Madam Chief Minister film review in Hindi

खोल पंख अब मार उडारी

‘मैं बचपन से जिद्दी हूँ, अक्खड़ हूँ’— जब तारा ये बात बोलती है तो दिल को छूती है. ये सच है कि जो औरतें जिद्दी होती हैं, वही दुनिया में अपनी जगह बना पाती हैं. जो स्त्रियाँ अपना हक मांगती हैं, अपनी शर्तों पर सम्मान से जीना चाहती हैं, उनको अक्सर लोग जिद्दी, बदमिजाज, बिगड़ी हुई औरत कहने लगते हैं. पर इन सब बातों को अनसुना करके जो मजबूत इरादों से आगे बढ़ती है वही स्त्री अपना नाम जिंदा रख पाती है वरना मिसिस शर्मा, मिसिस वर्मा, मिसिस गुप्ता… पप्पू की अम्मा, फलाने की बेटी, बहू, माँ ही उनकी पहचान रह जाती है.

मैडम चीफ़ मिनिस्टर (Madam Chief Minister)  यह फ़िल्म शुरू होती है, 1982 में दलितों की एक बारात को रोकने से. वहां एक दलित रूपराम मारा जाता है और दूसरी तरफ उसकी पत्नी एक बेटी को जन्म देती है जिसको उसकी दादी जहर देकर मार देना चाहती है. यही बच्ची आगे चल के तारा रूप राम (ऋचा चड्डा) बनती है.

तारा की कोई पॉलिटिकल एम्बिशन नहीं थी वो सवर्ण छात्र नेता इन्द्रमणि त्रिपाठी (अक्षय ओबेरॉय) से प्रेम करती है। उसके साथ शादी करके घर बसाना चाहती है. पर त्रिपाठी उसे केवल रखैल बनाकर रखना चाहता है, नहीं मानने पर उसको गुंडों से पिटवाता है, ऐन मौके पर दलित नेता मास्टर सूरज भान (सौरभ शुक्ला) उसको बचाते हैं. अपने अपमान से आहत प्रेम में ठगी गयी तारा बदला लेने की ठान लेती है. मास्टर जी के साथ वो ग्राउंड लेवल पर वर्क करते हुए राजनीति को समझने की कोशिश करती है. साम-दाम की नीति अपनाकर वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ़ चुनाव भी जीत जाती है और मुख्यमंत्री भी बन जाती है. अपने ओएसडी दानिश खान ( मानव कौल) और भाई बब्लू (निखिल विजय) की मदद से वो राजनीति की माहिर खिलाड़ी बन जाती है. साथ ही साथ मास्टर जी का हाथ भी उसके सिर पर बना रहता है. अपने धुर विरोधियों अरविन्द सिंह और इन्द्रमणि त्रिपाठी को कड़ी चुनौती देती है.

अपने लोगों को ऊपर उठाने के लिए अनेक काम जैसे लड़कियों में साइकिल और लैपटॉप बंटवाना, दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाना उसको लोकप्रिय बनाते हैं. जब लगता है कि सब कुछ ठीक हो रहा है, तब प्री क्लाइमेक्स चौंकाता है. और फ़िल्म का क्लाइमेक्स तारा को पूरी तरह एक कुशल राजनीतिज्ञ की भूमिका में दिखाता है. ये बात भी साफ़ हो जाती है कि ऊंचाई पर सभी अकेले हैं, ख़ासकर अपनी शर्तों पर जीने वाली ताकतवर स्त्री… उसे अपनी लड़ाई अपने ही दम पर लड़नी है.

फ़िल्म के संवाद मजेदार और चुटीले हैं, सुभाष कपूर इसके लिए जाने जाते हैं. तारा अपने भाषणों से लोगों की नस बखूबी पकड़ती है, वो भोली जनता को चुनावी राजनीति में अपना बनाना जानती है. पर चुनाव के बाद उनके लिए काम भी करती है। तारा के विकास कार्यों के असर को नज़र अंदाज़ करने की कोशिश करता एक नेता दूसरे से कहता है – “ये वो प्रदेश है जहाँ जो मेट्रो बनाता है वो हार जाता है और जो मंदिर बनाता है वो जीत जाता है.”

फ़िल्म शुरू में मायावती के जीवन से प्रेरित लगती है क्योंकि उत्तर प्रदेश में दलित मुख्यमंत्री का अकेला उदाहरण वही है, पर फ़िल्म धीरे-धीरे ममता बनर्जी और जयललिता के जीवनों को समेटती हुई भारत की डेमोक्रेसी में किसी भी स्त्री राजनीतिज्ञ की कहानी बन जाती है, कई जगह तो ऋचा चड्ढा के तेवर और घटनाक्रम से इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और जीवन झलकते हैं। ऋचा चड्ढा किरदार को उस ऊंचाई पर ले जाती हैं कि स्त्री का आक्रोश, दबंगपन, आत्मविश्वास और चैलेंज स्वीकारने की ज़िद सब दिखाई देते हैं, महसूस होते हैं। वैसे भी हमारे समाज में स्त्री का दर्जा दलित जैसा ही रहा है और जब वो स्त्री जात की भी दलित हो तो सिर्फ भोग की वस्तु बन जाती है, पर तारा इस बात को नकार कर जातिवाद और पितृसत्ता के खिलाफ झंडा बुलंद करती है. मास्टर जी उसको समझाते हैं – “दबंगों को अपनी सत्ता का घमंड है और ये घमंड टूटेगा हमारी सत्ता से”. तारा रूप राम से बात अच्छे से समझ जाती है कि सिस्टम को बाहर से कोसने से नहीं बल्कि उसमें शामिल हो कर ही उसे बदला जा सकता है.

 

मंगेश धाकडे का संगीत फ़िल्म को गति प्रदान करता है और भावुक क्षणों में थाम भी लेता है।
“चिड़ी- चिड़ी” गीत तारा के ट्रांसफॉर्मेशन को खूबसूरती से चित्रित करता है.
गीतकार दुष्यंत ने इसको बड़ी संजीदगी से पिरोया है. स्वानंद किरकिरे की आवाज़ ने गीत को नयी ऊंचाई दी है.

 

मेरी नज़र में, यह फ़िल्म क्रिटिक्स फ़िल्म नहीं है, मास की फ़िल्म है। तुलना से ही जिन्हें बात समझ आती है, उनके लिए कहूँ तो, ‘मैडम चीफ़ मिनिस्टर’  सलमान की ‘दबंग’ का ऋचा चड्ढा संस्करण है। पर पॉलिटिकल संजीदगी और तार्किकता से बिना कोई समझौता किए फ़िल्म अवाम की फ़िल्म है, छोटी-छोटी बात पर पहाड़ जितना मेल ईगो रखने वाले पुरुष समाज को (जिनमें ज़्यादातर क्रिटिक भी होंगे), और पुरुष मानसिकता में रची-बसी (संस्कारित) स्त्रियों को भी पचाना मुश्किल ही होगा। पर जो स्त्रियां संजीदगी और खुले दिमाग से तारा रूपराम के व्यक्तित्व को देखेंगी, समझेंगी, उन्हें फ़िल्म बेहतर जीवन के लिए ज़ोरदार प्रेरणा और ताक़त देगी, इसका मुझे पूरा भरोसा है।

सुभाष कपूर मास की फ़िल्म बनाते हुए संजीदगी से अपने संदेश कभी आटे में नमक की तरह, कभी सब्जी में हींग की तरह दे ही देते हैं। उनका यह हुनर उन्हें अन्य समकालीन मास ऑडिएंस के लिए फ़िल्म बनाने वाले डायरेक्टर्स से अलग खड़ा करता है। गंभीर विषय होते हुए भी इसमें शामिल ह्यूमर फ़िल्म को कहीं भी बोझिल नहीं होने देता है.

फ़िल्म की मुख्य निर्माता कांगड़ा टॉकीज की मालकिन डिम्पल खरबंदा और उनके को-प्रोड्यूसर्स : नरेन कुमार तथा टी-सिरीज  को ऐसी फ़िल्म के लिए शुकराना कहना तो बनता है।  खास बात यह भी अंडरलाइन किए जाने लायक है कि डिम्पल खरबंदा ने कांगड़ा टॉकीज की पहली फ़िल्म के रूप में वीमेन पावर की फ़िल्म बनाना तय किया। ये फ़िल्म स्त्री विजय की फ़िल्म है.

फ़िल्म देखी जानी चाहिए, अभी सिनेमा हॉल में जाकर देखेंगे तो तारा रूपराम का ग्रेंड और लार्जर दैन लाइफ किरदार बहुत प्रभावी तरीके से दिल तक पहुंचेगा, सिनेमा में देखना सम्भव नहीं हो तो बाद में जब नेटफ्लिक्स पर आए, तब ज़रूर देखिएगा।

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